Guru Nanak Dev Sahib Ji Hindi | गुरु नानक देव साहिब

नमस्कार दोस्तों Guru Nanak dev ji की यह पोस्ट में आपका स्वागत है। आजके इस पोस्ट में हम Guru Nanak ji के बारे में श्रद्धा पूर्वक जानेंगे। गुरू नानक जी सिख धर्म के संस्थापक है। सिख धर्म के लोग उन्हें अपना गुरू मानते है। 1469 ईस्वी में गुरू नानक जी का जन्म रावी नदी के किनारे स्थित तलवंडी नामक गाँव में कार्तिकी पूर्णिमा के दिन खत्रीकुल में हुआ था। इसलिए इस पवित्र दिन को गुरू नानक जन्म जयंती के रूप में मनाये जाते है। गुरू नानक जी के पिता का नाम मेहता कालूचंद खत्री था। तथा, माता का नाम तृप्ता देवी थी। और, उनकी एक बहन भी थी जिनका नाम नानकी था।

दोस्तों Guru Nanak Ji का जन्म स्थान तलवंडी पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में स्थित है। और, यही तलवंडी नामक गाँव को आगे चलकर ननकाना साहिब के नाम से जाना गया है। इसके साथ, सिख धर्म में प्रथम गुरू नानक जी (1) के बाद और भी कई गुरू हुए जैसे गुरू अंगद देव जी (2), गुरू अमर दास जी (3), गुरू राम दास जी (4), गुरू अर्जुन देव जी (5), गुरू हरगोबिन्द जी (6), गुरू हर राय जी (7), गुरू हर किशन जी (8), गुरू तेग बहादुर जी (9) और दसवी गुरु के तोर पर गुरू गोबिंद सिंह जी (10) को जाना जाता है। दोस्तों आगे इस पोस्ट में इन सभी गुरूओ के बारे में भी थोड़ा जानेंगे।   

Early life of Guru Nanak Dev Ji

  • Guru Nanak Ji बचपन से ही तेज बुद्धि के थे परन्तु पढ़ने लिखने में उनकी विशेष रुचि नहीं थी।
  • और, 7 – 8 साल की उम्र में उन्होंने स्कूल छोड़ दिया था।
  • क्यों की स्कूल में अक्सर Nanak Ji अध्यापक को परमात्मा से जुड़ी हुई प्रश्न पूछ लिया करते थे,
  • जिसके उत्तर में अध्यापक हार मान जाते थे।
  • इसके बाद गुरू नानक जी आपने ज्यादा तर समय आध्यात्मिक चिंतन और सत्संग में व्यतीत करने लगे थे।
  • और, बचपन की यही समयकाल के दौरान नानक जी के द्वारा कई चमत्कारिक घटनाएं भी घटीं थी।
  • जिसके कारन उस गाँव के शासक राय बुलार और लोगो ने नानक जी को दिव्य व्यक्तित्व मानते थे।  
  • इसके साथ Guru Nanak Ji की बहन नानकी भी उनके ऊपर काफी श्रद्धा रखती थी।
  • उसके प्रश्चात, गुरू नानक जी जब सोलह साल के हुए तव उनका विवाह सुलक्खनी देवी से कर दी गई थी।
  • गुरू नानक जी के दो पुत्र थे इनके प्रथम पुत्र का नाम श्रीचंद और दूसरे पुत्र का नाम लखमीदास था।
  • और, 1505 ईस्वी के आसपास में Nanak Ji का उम्र जब छत्तीस साल के हुए,
  • तव उन्होंने परिवार को त्याग कर आध्यात्मिक के रास्ते में चल पड़े थे।  

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‘’Second phase of Guruji’s life (Guru Nanak dev Ji)’’

  • आध्यात्मिक के रास्ते में दो वर्ष चलने के बाद अड़तीस साल के उमर में गुरू नानक जी ने वेन नदी के किनारे में ज्ञान की प्राप्ति की थी।
  • इसके बाद Guru Nanak Ji ने मुख्य मुख्य स्थानों की यात्रा प्रारंभ की थी।  
  • उन्होंने, फारस, अरब, अफगानिस्तान और भारत जैसे देशो की यात्रा की और चारो ओर घूमकर उपदेश दिए।
  • और, Guru Nanak Ji की इन यात्राओं को पंजाबी में ‘उदासियाँ’ भी कहा जाता है।   

Guru Nanak ji got merged in the supreme light   

  • Guru Nanak Ji ने आपने यात्राओं के माध्यम से बहुत से लोगों को सिख धर्म का अनुयायी बनाये थे।
  • इनके अनुयायी इन्हें बाबा नानक, नानकशाह, नानक और नानक देव जी के नामों से संबोधित करते हैं।
  • और, गुरू नानक जी एक अच्छे कवि होने के साथ साथ एक समाजसुधारक, धर्मसुधारक, विश्वबंधु और देशभक्त भी थे।
  • तथा, नानक जी Nanak Ji का हृदय बहुत कोमल था इसीलिए प्रकृति से एकात्म होने की अभिव्यक्ति भी उनकी निराली थी।
  • गुरू नानक जी मूर्तिपूजा में विस्वास नही रखते थे उन्होंने परमात्मा की उपासना के लिए एक अलग मार्ग मानवता को दिया है।
  • इन्ही महान गुणों के कारन गुरू नानक जी आपने अंतिम जीवन में बहुत प्रसिद्ध हुए थे।  
  • उन्होंने आपने अनुयायी के साथ रावी नदी के तट पएक डेरा जमाये थे,
  • जो, आगे चलकर गुरुद्वारा डेरा बाबा नानक के नाम से जाना गया है।
  • और, गुरू नानक जी ने मानवता कि सेवा में आपने समय तथा स्वयं को समर्पित किये थे।
  • उन्होंने पाकिस्तान में स्थित करतारपुर नामक एक नगर बसाये और एक धर्मशाला भी बनवाये थे।
  • और, 1539 ईस्वी में इसी स्थान पर गुरू नानक जी परलोक वास हुए एवं परम ज्योति में विलीन हो गए।   
Guru Nanak Dev Ji
Guru Nanak Dev Ji

Second Sikh Guru Angad Dev Sahib Ji

  • Guru Nanak Dev Ji के मृत्यु से पहले भाई लहना जी नानक जी से मिलने करतारपुर गए,
  • और, उनकी गुरमत वाणी से प्रभावित होकर करतारपुर में निवास करने लगे थे।
  • लहना जी का जन्म पंजाब के फिरोजपुर में हरीके नामक गांव में 31 मार्च 1504 में हुआ था। 
  • इन्होने Guru Nanak Dev Ji की पवित्र मिशन के प्रति अटूट भक्ति, ज्ञान एवं श्रद्धा से स्वयं को समर्पित किया था।
  • और, इसी भक्ति भाव को देखते हुए सतगुरू नानक साहिब जी ने 7 सितम्बर 1539 में लहना जी को गुरुपद प्रदान किया,
  • और, गुरमत के प्रचार का जिम्मा सौंपा दिया था।
  • तथा, Guru Nanak Ji ने उन्हें एक नया नाम अंगद दिया था।  
  • गुरू नानक देव जी के प्रश्चात गुरू अंगद देव जी सिखो के दूसरे गुरू हुए थे।
  • अंगद देव जी का पिता का नाम फेरू जी और माता का नाम रामो देवी जी था।
  • गुरू अंगद देव जी गुरू आत्मा के प्रतिनिधि थे।  
  • उन्होंने ब्यास नदी के किनारे स्थित अमृतसर से लगभग 25 कि॰मी॰ दूर खडूर साहिब नामक गांव में गुरुगद्दी का निर्माण भी कराया था।
  • और, गुरुगद्दी के माध्यम से सिख धर्म का प्रचार प्रसार की व्यवस्था शुरू की थी।
  • इन्होने Guru Nanak Dev Ji द्वारा चलाया गया लंगर व्यवस्था को भी स्थायी कर दी थी।
  • इसके साथ, अंगद देव जी ने 1541 ईस्वी में गुरू नानक देव जी द्वारा लिखि गई “पंजाबी बोली” का शुद्व” गुरमुखी लिपी को भी प्रचलित किया था।
  • और, मार्च महीने की ही 28 तारीख को 1552 ईस्वी में गुरू अंगद देव जी ईश्वर को प्राप्ति हुए।  

  Third Sikh Guru Amar Das Sahib Ji

  • गुरू अंगद देव जी बाद गुरू अमर दास जी 1552 ईस्वी में सिखो के तृतीय गुरू हुए।   
  • गुरू होने से पहले अमर दास जी गुरू अंगद साहिब जी की पुत्री बीबी अमरो जी के मुखारविन्द से एक बार गुरू नानक साहिब के शब्द सुने,
  • और, इससे प्रभावित होकर अमर दास जी गुरू अंगद देव जी से मिलने खडूर साहिब चले गए थे।
  • और, वहा पे उन्होंने गुरू अंगद देव जी को अपना गुरू बना लिया और खडूर में रहने लगे थे।  
  • गुरू अमरदास साहिब जी की भक्ति एवं सेवा और दिए गए शिक्षा के परिणाम ही अमर दास जी तृतीय गुरू बने थे।
  • इन्होने बाईस गुरुगद्दी का निर्माण किया और सबसे ज्यादा सिख धर्म का प्रचार प्रसार किया।
  • और, 1574 ईस्वी में गुरू अमरदास साहिब जी ईश्वर को प्राप्ति हुए।    

Fourth Sikh Guru Ram Das Sahib Ji

  • गुरू अमरदास जी के पश्चात उनका दामाद गुरू राम दास जी को उत्तराधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया,
  • और, 1574 ईस्वी में अमरदास जी सिखो के चौथे गुरू हुए।
  • गुरू राम दास जी मुग़ल साम्राज्य के राजा अकबर के समकालीन थे।
  • और, अकबर गुरू राम दास जी को बहुत मानते थे इसलिए अकबर ने उन्हें पांच-सौ वीघा भूमि भेंट की थी।
  • और, इसी भूमि पर गुरू राम दास जी ने अमृतसर शहर को बसाया था।
  • इसके साथ गुरू रामदास जी ने अमृत सरोवर के मध्य में हरमंदिर साहिब का निर्माण (1570 – 1577 ईस्वी) किया।
  • जिसे स्वर्ण मंदिर के नाम से जाना जाता है।
  • इन्होने आपने तृतीय पुत्र अर्जुन देव जी को अपना उत्तराधिकारी बनाया था।
  • और, 1581 ईस्वी में गुरू राम दास जी ने अपना शरीर त्याग दिया था।  

 Fifth Sikh Guru Arjun Dev Sahib Ji   

  • गुरू अमरदास जी के पश्चात गुरू अर्जुन देव जी 1581 ईस्वी में सिखो के पांचवे गुरू हुए।
  • और, गुरू अर्जुन देव जी बहुत शांत और गंभीर स्वभाव के स्वामी थे। ।
  • गुरू अर्जुन देव जी ने आदिग्रन्थ का संपादन किया था और इन्हे गुरू ग्रन्थ साहिब भी कहते है।
  • और, यह ग्रन्थ का प्रकाश 30 अगस्त 1604 ईस्वी में हरमंदिर साहिब में हुआ था।
  • इन्होने मानव-कल्याण के लिए आजीवन शुभ कार्य किए और आपने युग के सर्वमान्य लोकनायक बने।
  • और, सुखमनी साहिब गुरू अर्जुन देव जी की रचित वाणी है जो सुख का आनंद प्रदान करती है।
  • सुखमनी साहिब मानसिक तनाव की अवस्था का शुद्धीकरण भी करती है।
  • अकबर के देहांत के बाद जहांगीर दिल्ली का शासक बना परन्तु वह कट्टर-पंथी था।
  • जहांगीर को आपने धर्म के अलावा और कोई धर्म पसंद नहीं था।
  • इसीलिए, जहांगीर ने गुरू अर्जुन देव जी को अनेक कष्ट दिए परन्तु गुरू जी शांत रहे,
  • और, 1606 ईस्वी में हंसते-हंसते गुरू अर्जुन देव जी ने शहीदी को प्राप्त किये।  
  • गुरू अर्जुन देव जी धर्म-निरपेक्ष विचारधारा के समर्थक थे जिसके कारन उन्होंने आत्म-बलिदान दिया।
  • उनका यह संदेश था की जीवन मूल्यों के लिए आत्म-बलिदान देने को सदैव तैयार रहना चाहिए,
  • तभी, कौम और राष्ट्र अपने गौरव के साथ जीवंत रह सकते हैं।
  • और, गुरुमतिविचारधाराकेप्रचार-प्रसार में गुरू अर्जुन देव जी की भूमिका एहम थी। 
Sixth Sikh Guru Hargobind Sahib Ji 
  • गुरू अर्जुन देव जी के बाद उनका पुत्र गुरू हरगोबिन्द जी 1606 ईस्वी में सिखो के छठें गुरू हुए।
  • गुरू हरगोबिन्द जी शिक्षा दीक्षा के महान विद्वान् थे और उन्होंने शास्त्र की शिक्षा भी ग्रहण की एवं विभिन्न प्रकार के शस्त्र चलाने भी जानते थे।   
  • उनका मकसद सिख कौम में शान्ति, भक्ति एवं धर्म के साथ-साथ अत्याचार एवं जुल्म का मुकाबला करने के लिए सक्षम बनाना था।
  • तथा, गुरुगद्दी को संभालने के लिए बाबा बुड्डाजी ने उन्हें मीरी एवं पीरी की दो तलवारें भी पहनाई थी।
  • और, गुरू हरगोबिन्द जी ने नानक (Nanak) राज को स्थापित करने में सफलता की ओर कदम बढ़ाई।
  • उन्होंने लोगों के मन में मुगल सल्तनत के प्रति विद्रोह जगाई थी।
  • जिसके कारन जहांगीर ने गुरू हरगोबिन्द जी को ग्वालियर के किले में बन्दी बनाई थी।
  • और, इस किले में पहले से ही बावन राजा बन्दी थे।
  • लेकिन महान सूफी फकीर मीयांमीर और जहांगीर की बेगम नूरजहांमीयांमीर ने जहांगीर को गुरू हरगोबिन्द जी की महानता के बारे में बताई,
  • जिसके फलस्वरूप जहांगीर ने उन्हें किले से सिर्फ आजाद नहीं किया,
  • बल्कि उन्हें यह स्वतन्त्रता भी दिए की बन्दी रहे बावन राजाओं को आपने साथ लेकर जा सके।
  • इसीलिए सिखो के इतिहास में गुरू हरगोबिन्द जी को बन्दी छोड़ दाता कहा जाता है।
  • और, सिख लहर को प्रभावशाली बनाने में गुरू हरगोबिन्द जी का अद्वितीय योगदान रहा है।
  • और, 1644 ईस्वी में गुरू हरगोबिन्द जी ने अपना शरीर त्याग दिया था।  
Seventh Sikh Guru Har Rai Sahib Ji   
  • गुरू हरगोबिन्द जी के बाद गुरू हर राय जी सिखो के सातवें गुरू हुए।
  • आपने मृत्यू से पहले गुरू हरगोविन्द जी ने आपने पोते हरराय जी को चौदह वर्ष की आयु में 1644 ईस्वी में ‘सप्तम्‌ गुरू’ के रूप में घोशित किया था।
  • गुरू हर राय जी एक आध्यात्मिक पुरुष एवं एक योद्धा होने के साथ-साथ एक राजनीतिज्ञ भी थे।
  • और, शाहजहां के बड़े पुत्र दारा शिकोह भी गुरू हरगोबिन्द जी को बहुत मानते थे।
  • गुरू हर राय जी ने कीरतपुर में एक आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी दवाईयों का अस्पताल एवं अनुसंधान केन्द्र की भी स्थापना की थी।  
  • जहां पे उन्होंने अज्ञात बीमारी से ग्रसित दारा शिकोह की ईलाज किये और उन्हें बचा लिया।
  • गुरू हर राय जी ने आपने गुरूपद काल के दौरान बहुत सी कठिनाइयों का सामना भी किया था।
  • क्यों की दारा शिकोह को बचाये जाने पर औरंगजेब ने सत्ता संघर्ष की स्थितियों में यह मुद्दे को राजनैतिक बनाया,
  • और, गुरू हर राय जी के ऊपर बेबुनियाद आरोप भी लगाये थे।
  • और, गुरू हर राय जी के प्रथम पुत्र रामराय जी ने दिल्ली में औरंगजेब से मिलकर गुरूपद की मर्यादा को कमजोर करने की भी कोशिस की थी।
  • परन्तु राम राय जी सफल न हो पाया और गुरू हर राय जी ने उन्हें सिख पंथ से निष्कासित कर दिया।
  • और, ईसी घटना के बाद सिखो ने गुरु घर की परम्पराओं के प्रति अुनशासित हो गए।
  • तथा, गुरू नानक देव जी द्वारा बनाये गये किसी भी प्रकार के नियमों में फेरबदल करने वालों के लिए एक कड़ा कानून बना दिया गया था।
  • इसके प्रश्चात गुरू हर राय जी ने आपने अंतिम समय में आपने छोटे पुत्र गुरू हर किशन जी को ‘अष्टम्‌ नानक’ के रूप में घोषित किया।
  • और, 1661 ईस्वी में गुरू हर राय जी ईश्वर को प्राप्ति हुए।
Eighth Sikh Guru Har Kishan Sahib Ji
  • गुरू हर राय जी के पश्चात आठ वर्ष के आयु में सिखो के अष्ठम्‌ गुरू के रूप में गुरू हर किशन जी हुए।
  • गुरू हर किशन जी का जन्म 1656 ईस्वी में हुआ था।
  • अल्प आयु में गुरू का पद मिलने पर कई विवाद हुए जिसके कारन औरंगजेब ने उन्हें दिल्ली लाने के लिए राजा जय सिंह को भार दिया था।
  • और, दिल्ली आने से पहले उन्होंने हिन्दू साहित्य के विद्वान एवं आध्यात्मिक पुरुष लाल चन्द को गुरू महिमा से प्रभावित किया।
  • बालक होने के कारन लाल चन्द जी ने गुरू हर किशन जी को गीता के श्लोकों का अर्थ करने की चुनौती दी और एक अनपढ़ को साथ लाये।
  • गुरू हर किशन जी ने उस अनपढ़ आदमी को छज्जु के सरोवर में स्नान कराये और गुरू महिमा किया,
  • और, वह आदमी के मुखारविंद से संपूर्ण गीता सार सुनाकर लाल चन्द जी नतमस्तक हुए और उन्होंने सिख धर्म को अपना लिया।
  • इसके बाद गुरू हर किशन जी दिल्ली पहुंचे जहां पे राजा जय सिंह ने उनका भव्य स्वागत किया।
  • लेकिन उस समय दिल्ली में मुगल राज की जनता छोटी माता और हैजा जैसे महामारी के प्रकोप से जुज रहे थे।
  • गुरू हर किशन जी ने देर न करते हुए सेवा का अभियान चलाया और मुगल जनता को स्वस्थ किया।
  • इसीलिए मुगल जनता उन्हें बाला पीर कहकर पुकारने लगे और इन परिस्थितियों को देखते हुए औरंगजेब भी नतमस्तक हुए।  
  • लेकिन मानवता की सेवा करते करते गुरू हर किशन जी खुद बीमार हो गए।
  • और, आठ साल की उम्र में 1664 ईस्वी में गुरू हर किशन जी ईश्वर को प्राप्ति हुए।
Ninth Sikh Guru Teg Bahadur Sahib Ji
  • गुरू हर किशन जी के पश्चात गुरू तेग़ बहादुर जी 1665 ईस्वी में सिखो के नवें गुरू हुए।
  • गुरू हर किशन जी की अंतिम समय में उत्तराधिकारी के रूप में उन्होंने ‘बाबा बकाला’ का नाम लिया था।
  • जिन्हे तेग़ बहादुर के नाम से जाना जाता है।
  • उस समय गुरू तेग़ बहादुर जी पंजाब में ब्यास नदी के किनारे स्थित बकाला गांव में रहते थे।
  • गुरू होने के बाद तेग़ बहादुर जी ने 115 पद्य की रचना की थी और यही रचना गुरु ग्रन्थ साहिब में सम्मिलित हैं।
  • इसके साथ उन्होंने असम, बनारस, पटना और प्रयाग जैसे क्षेत्रों की यात्रा की और वहाँ के लोगों की उन्नयन के लिए कई रचनात्मक कार्य किए।
  • और, औरंगजेब के शासनकाल में गुरू तेग़ बहादुर जी ने काश्मीरी पण्डितों तथा अन्य हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाने का भी विरोध किया।
  • लेकिन, 1675 ईस्वी में इस्लाम स्वीकारकरने के कारन गुरू तेग़ बहादुर जी को प्राण की आहुति देनी पड़ी थी।     
Tenth Sikh Guru Govind Singh Sahib Ji
  • गुरू तेग़ बहादुर जी के यात्रा के दौरान 1666 ईस्वी में पटना साहिब में उनके पुत्र गुरू गोबिन्द सिंह जी का जन्म हुआ था।
  • और, गुरू तेग़ बहादुर जी के प्रश्चात 1675 ईस्वी में सिखो के दसवें गुरू के रूप में गुरू गोबिन्द सिंह जी को जाना जाता है।
  • उन्होंने मुग़लों के विरुद्ध ‘चौदह युद्ध’ लड़े और धर्म के लिए आपने समस्त परिवार का बलिदान किये,
  • इसलिए उन्हें सर्ववंशदानी भी कहा जाता है।
  • गुरू गोबिन्द सिंह जी एक महान लेखक के साथ कई भाषाओं के ज्ञाता भी थे।
  • इसके साथ उन्होंने मानवता की एकता के लिए सदा प्रेम एवं भाईचारे का भी संदेश दिये।
  • गुरू गोबिन्द सिंह जी ने ‘’खालसा’’ का निर्माण किया था जो की सिख धर्म के विधिवत् दीक्षा प्राप्त अनुयायियों का एक सामूहिक रूप है।
  • उन्होंने पहले पांच खालसा बनाये और छठवां खालसा के रूप में गुरू गोबिंद राय से गुरू गोबिंद सिंह जी बने।
  • इसके साथ गुरू गोबिन्द सिंह जी ने केश, कंघा, कड़ा, किरपान और कच्चेरा इन पांच ककारों का महत्व खालसा के लिए समझाये।
  • और, गुरू गोबिन्द सिंह जी को दशमेश, कलगीधर और बाजांवाले जैसे उपाधियों से भी जाने जाते हैं।
  • इसके प्रश्चात 1705 ईस्वी में गुरू गोबिन्द सिंह जी की खालसा के साथ मुगलों से भयानक युद्ध हुआ और मुग़ल हार गए।
  • इसी हार के बाद गुरू गोबिन्द सिंह जी को औरंगजेब की मृत्यु के बारे में पता लगा।
  • औरंगजेब की मृत्यु के बाद गुरू गोबिन्द सिंह जी की मदद से बहादुरशाह दिल्ली का बादशाह बना।
  • और, इसी कारन नवाब वजीत खान ने धोखे से गुरू गोबिन्द सिंह जी के ऊपर हमला करवाये,
  • और, गुरुजी 1708 ईस्वी में ईश्वर को प्राप्ति हो गए।
Conclusion  
  • अंत समय में गुरू गोबिन्द सिंह जी ने सिक्खों को ‘’गुरू ग्रंथ साहिब’’ को अपना गुरू मानने को कहा और स्वयं भी माथा टेका था।
  • गुरू गोबिन्द सिंह जी के बाद सिख बंदासिंह बहादुर ने सभी आक्रमणकारी का विनाश कर दिया था। 
  • दोस्तों सिख धर्म एक महान धर्म है। 
  • और, सिख धर्म के गुरूओ ने हमेशा धर्म-निरपेक्ष विचारधारा के समर्थक के साथ एकता और भाई चारे के ऊपर लोगो के मन में विश्वास को जगाया है।
  • और, लोग कल्याण के लिए सिख धर्म के गुरूओ द्वारा प्रदान किये गए सेबा अतुलनीय है।
  • जिसका झलक अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में देखा जा सकता है।
  • इसके साथ सिखो के दसवें गुरू गोबिन्द सिंह जी द्वारा दिए गए जयकारा ”जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल” बहुत प्रचलित है।
  • सिखों द्वारा एक-दूसरे का अभिवादन करने के लिए इस पद का उप्योग किया जाता है।            

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